सिटी बिग न्यूज | हिसार
हरियाणा के हिसार में नगर निगम चुनाव के दौरान एक सरकारी कर्मचारी पर अपनी पत्नी के लिए चुनाव प्रचार करने का आरोप लगा है। वार्ड नंबर 3 से भारतीय जनता पार्टी (BJP) की उम्मीदवार ज्योति वर्मा के पति सुनील वर्मा, जो नगर निगम हिसार में असिस्टेंट प्रोजेक्ट ऑफिसर (APO) के पद पर कार्यरत हैं, घर-घर जाकर वोट मांग रहे हैं। इस मामले को लेकर हिसाब दो, जवाब दो एसोसिएशन ने चुनाव आयोग से शिकायत दर्ज कराई है।
संस्था के अध्यक्ष राजीव सरदाना और सदस्य आशीष जैन, ललित भाटिया, प्रशांत शर्मा व उदय यादव ने इस मामले को लेकर चुनाव आयोग को वीडियो और फोटो सबूत भी सौंपे हैं। उनका आरोप है कि प्रशासन एक राजनीतिक दल का खुलेआम समर्थन कर रहा है, जिससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हो रही है।
पत्नी के नामांकन में भी रहे शामिल
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि सुनील वर्मा न केवल प्रचार कर रहे हैं, बल्कि उन्होंने अपनी पत्नी का नामांकन भरवाने में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वे BDO ऑफिस में अपनी पत्नी ज्योति वर्मा के नामांकन पत्र दाखिल करने गए थे।
इस बात की पुष्टि BDO ऑफिस के सीसीटीवी फुटेज से की जा सकती है। यह आचार संहिता का स्पष्ट उल्लंघन माना जा रहा है।
सरकार की मेहरबानी या नियमों की अनदेखी?
चुनावी शिकायत में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि सुनील वर्मा शुरू से ही भाजपा से जुड़े हुए हैं। मनोहर लाल खट्टर सरकार के कार्यकाल में उन्हें हिसार नगर निगम में मनोनीत पार्षद बनाया गया था। पार्षदी का कार्यकाल खत्म होते ही उन्हें नगर निगम में असिस्टेंट प्रोजेक्ट ऑफिसर (APO) की नौकरी मिल गई।
APO का पद जनता से सीधे जुड़ा होता है क्योंकि यह नगर निगम की विभिन्न योजनाओं के कार्यान्वयन में भूमिका निभाते हैं। वर्तमान में सुनील वर्मा स्ट्रीट वेंडर्स के पुनर्वास प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं, जिससे वे जनता के संपर्क में रहते हैं। शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि यह स्थिति उन्हें चुनावी फायदे के लिए प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग करने का अवसर देती है।
चुनाव आयोग से निष्पक्ष जांच की मांग
एसोसिएशन ने चुनाव आयोग से मांग की है कि इस मामले में निष्पक्ष जांच की जाए और सरकारी पद पर रहते हुए किसी भी प्रत्याशी के प्रचार में शामिल होने वाले कर्मचारी के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए।
प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने यह भी कहा कि यदि यह मामला अनदेखा किया गया, तो इससे अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए भी गलत उदाहरण पेश होगा।
चुनाव आयोग की ओर से अब तक इस शिकायत पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन यह मामला चुनावी माहौल में चर्चा का विषय बन गया है।







































